एक कचरा उठाने वाले से लेकर एक मशहूर फोटोग्राफर बनने के कहानी।



नमस्कार दोस्तो, आज हम बात करेंगे एक मशहूर फोटोग्राफर "विक्की रॉय" के बारे में जिसके पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े भी नही थे | स्थिति कुछ ऐसी थी कि इनके पास खाने के लिए ढंका   खाना तक नही था | जहां सब बच्चे सर्दियों में अपने घरों से बाहर नही निकलते वही ये अपना गुजारा करने के लिए बर्तन धोते थे |
इनका जन्म वेस्ट बेंगाल के एक छोटे से गाँव पुरलिया मे हुआ था | इनके माता-पिता अपनी जिंदगी ही बड़ी कठनाईयों से गुजार रहे थे..तो इनका तो जीना भी बड़ा मुश्किल था | इनके माता-पिता ने इन्हें अपने नाना-नानी के घर भेज दिया | लेकिन मेरे दोस्त कहानी अब भी नही बदली | इनका एक शौक था और वो है घूमना लेकिन घूमना तो दूर इन्हें घर से बाहर तक नही निकलने दिया जाता था | स्कूल से घर और घर से स्कूल ...जिंदगी वही अटक कर रह गयी | जैसे-जैसे ये बड़े हो रहे थे इन पर काम का वजन बढ़ता जा रहा था | कई बार तो इन्हें बुरी तरह मारा और पीटा भी जाता था |
फिर इन्होंने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी को
कुछ भी उम्मीद नही थी | इन्होंने अपने मां के जेब से नो सौ रुपये चुराए और ये घर से भाग गए | कुछ पता नही था कि क्या करना है, कैसे रहना है, कहा रहना है | कुछ नही सोचा | बस इस तरह नही रहना था | उस समय ये गलती से दिल्ली के लिए जाने वाली एक ट्रेन में बैठ गए ...कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या चल रहा है | जैसे ही ये दिल्ली पहुचे इतनी सारी भीड़ को देखकर इतने ज्यादा घबरा गए की रोने लग गए | वहां स्टेशन पर उन्हें कुछ लड़के मिले ..बोले भाग के आया है ? सर झुकाकर बोले हा | वो लड़के इन्हें एक अनाथ आश्रम ले गए बोला अब यही रह..जो भी है अब यही है | लेकिन उस ग्यारह साल के बच्चे की हिम्मत देखना मेरे दोस्तों वो वहां से भी भाग गया | क्यो भागा.. क्योंकि बाहर नही निकलने देते थे | रक जेल जैसा लगता था वहां का माहौल | दोबारा रेलवे स्टेशन आये और वहां कचरा उठाने का काम शुरू कर दिया | वहां भी ज्यादा दिन काम नही कर पाए मन ही मन सोचा कि ऐसे काम नही चलेगा ..कुछ तो करना है | उन्होंने वही एक ढाबा था..उसपे काम मांगा | अब काम तो मिला लेकिन पूरे दिन काम करना पड़ता था | सुबह के चार बजे से रात के बारह बजे तक वो भी इतनी ठंड में | कई बार तो हाथों से खून तक निकल आता था..हाथो में घाव हो गए थे | फिर एक दिन एक सज्जन आदमी जो कि सलाम बालक अनाथालय का सदस्य था | उसने कहा जिस उम्र में बच्चे पढ़ाई करते है तुम बर्तन धो रहे हो | उस सज्जन आदमी को दया आयी और वो हमारी कहानी के हीरो को अपने साथ ले गए | पढ़ाई में ज्यादा अच्छे नही थे लेकिन किस्मत ने इस बार इनका साथ दिया | इनके अनाथालय (सलाम बालक ट्रस्ट) में एक ब्रिटिश फोटोग्राफर आये हुए थे | इनके मन मे आया घूमने का लालच ..मन मे सोच चलो फोटोग्राफी ही सिख लेते है | इन्होंने अपने सर से ये बात कही और इनका काम बन गया | उस फोटोग्राफर का नाम था डिक्सी बेंजामिन | तो ये उनके साथ श्रीलंका चले गए | इन्हें इंग्लिश नही आती थी तो इनके कुछ ज्यादा पल्ले नही पड़ा | ये वापस मुम्बई आ गए और "एनी मान" के अंडर में काम करने लगे | इसी के साथ वो वेटर का भी काम करते थे | सन 2007 में जब ये बीस साल के हुए तो इन्होंने अपनी फोटोग्राफी से बचाये पैसो से एक प्रदर्शनी लगाई जिसका नाम था "स्ट्रीट ड्रीम्स" | ये प्रदर्शनी इंडियन हेबिटेट सेंटर में लगाई गई थी | जिससे इन्हें काफी सराहना मिली और इन्हें अपनी मंजिल की तरफ एक नई दिशा मिली | इसके बाद वो विदेशो में भी फ़ोटोग्राफी के लिए गए और वापस भारत आने पर इन्हें अपने अनाथालय द्वारा "INTERNATIONAL AWARD FOR YOUNG PEOPLE" से सम्मानित किया गया | सन 2013 में इन्हें टॉप आठ फोटोग्राफर्स में चुना गया |
इस कहानी से यही साबित होता है दोस्तो की आपकी परीस्थितिया कभी भी आपकी सफलता को नही रोक सकती ..मैं तो यही कहूंगा दोस्तो की बस लगे रहिये आपको सफलता जरूर मिलेगी |
धन्यवाद दोस्तों|
जय हिंद ! जय भारत !

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